रूढ़ शब्द :‘न’, ‘हि’, ‘शक्यं’, ‘त्यक्तुं’जैसे शब्दरूढ़शब्द हैं। इनकी प्रकृति स्वतंत्र है अर्थात् इनका निर्माण किसी अन्य शब्द या शब्दों से नहीं हुआ है। ये शब्द स्वतः पूर्ण होते हैं। इन्हें मूल शब्द भी कहा जाता है। मूल शब्द में प्रत्यय, उपसर्ग जोड़ने से बननेवाले शब्दों को भी रूढ़ शब्द ही माना जाएगा। गीता में प्रयुक्त रूढ़ शब्दों का उसी स्वरूप में इस पुस्तक में उल्लेख किया गया है। यौगिक शब्द :‘देहभृता’,‘कर्माण्यशेषतः’, ‘यस्तु’,‘कर्मफलत्यागी’ तथा ‘त्यागीत्यभिधीयते’ जैसे शब्द यौगिक शब्द हैं। ऐसे शब्द संयोग,समास अथवा संधि प्रक्रिया द्वारा दो या अधिक शब्दों के परस्पर जुड़ने से बनते हैं। गीता में प्रयुक्त यौगिक शब्दों का उसी स्वरूप में इस पुस्तक में उल्लेख के साथ-साथ ही उसके सभी घटक शब्दों का भी उल्लेख किया गया है। इसके लिए पहले हर यौगिक शब्द का उसके रूढ़ शब्दों में विग्रह किया गया। उदाहरणार्थ, ‘कर्मफलत्यागी’ शब्द को तीन रूढ़शब्दों- ‘कर्म’, ‘फल’ और ‘त्यागी’ में विभाजित किया गया। अत: जब अनुक्रमणिका में हम ‘कर्म’ शब्द देखेंगे तो उसे पंक्ति क्रमांक 18.11.2 में पाएँगे, उसके अतिरिक्त उस शब्द को भी पाएँगे जिसका यह घटक है। ‘कर्म’ शब्द जिन अन्य शब्दों का घटक बनकर प्रयुक्त हुआ है, वे हैं-....यत्कर्म(18.9.1), कर्मफलत्यागी (18.11.2), शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म (18.15.1),… आदि।
इस अनुक्रमणिका का उद्देश्य यह ज्ञात करनाहै कि क्या दिए गए किसी संस्कृत शब्द
का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में
हुआ है, और यदि हुआ है तो किस-किस श्लोक में। इस अनुक्रमणिका का उपयोग कैसे किया जाए यह समझने के लिए अध्याय 18 से निम्न श्लोक का उदाहरण
लेते हैं—
न हि देहभृता शक्यं
त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स
त्यागीत्यभिधीयते ॥11॥
इस अनुक्रमणिका में गीता के प्रत्येक श्लोक की हर पंक्ति को एक विशिष्ट क्रमांकदिया
गया है। इसमें अध्यायक्रमांक, श्लोक क्रमांक व
पंक्ति क्रमांकतीनों का उल्लेख है। इसके अनुसार उपर्युक्त श्लोक में प्रथम पंक्ति का
क्रमांक18.11.1 और द्वितीय पंक्ति का क्रमांक 18.11.2होगा। अत: विशिष्ट क्रमांक के साथ यह श्लोक इस प्रकार होगा—
न हि देहभृता शक्यं
त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । 18.11.1
यस्तु कर्मफलत्यागी स
त्यागीत्यभिधीयते ॥ 18.11.2
यदि हम संस्कृत के किसी शब्द को इस
अनुक्रमणिका में खोजते हैं तो या तो वह मिलेगा नहीं (अर्थात् वह शब्द गीता में है
ही नहीं), और यदि मिला तो उसके आगे जिस-जिस पंक्ति में वह शब्द है उसका विशिष्ट क्रमांक
मिलेगा। उदाहरण के तौर पर यदि हम जानना चाहें कि ‘देहभृता’ गीता में है या
नहीं, तो अनुक्रमणिका में हम पाएँगे–
देहभृता18.11.1अर्थात यह शब्द गीता में पंक्ति
क्रमांक 18.11.1 में है। (अध्याय 18, श्लोक 11, पंक्ति 1)
गीता में शब्द प्रकार
गीता में हम तीन प्रकार के शब्द पाते हैं:-
रूढ़ शब्द :‘न’, ‘हि’, ‘शक्यं’,
‘त्यक्तुं’जैसे शब्दरूढ़शब्द हैं। इनकी प्रकृति
स्वतंत्र है अर्थात् इनका निर्माण किसी अन्य शब्द या शब्दों से नहीं हुआ है। ये
शब्द स्वतः पूर्ण होते हैं। इन्हें मूल शब्द भी कहा जाता है। मूल शब्द में
प्रत्यय, उपसर्ग जोड़ने से बननेवाले शब्दों को भी रूढ़ शब्द ही माना जाएगा। गीता में
प्रयुक्त रूढ़ शब्दों का उसी स्वरूप में इस पुस्तक में उल्लेख किया गया है।
यौगिक शब्द :‘देहभृता’,‘कर्माण्यशेषतः’, ‘यस्तु’,‘कर्मफलत्यागी’
तथा ‘त्यागीत्यभिधीयते’ जैसे
शब्द यौगिक शब्द हैं। ऐसे शब्द संयोग,समास अथवा संधि
प्रक्रिया द्वारा दो या अधिक शब्दों के परस्पर जुड़ने से बनते हैं। गीता में
प्रयुक्त यौगिक शब्दों का उसी स्वरूप में इस पुस्तक में उल्लेख के साथ-साथ ही उसके
सभी घटक शब्दों का भी उल्लेख किया गया है। इसके लिए पहले हर यौगिक शब्द का उसके
रूढ़ शब्दों में विग्रह किया गया। उदाहरणार्थ, ‘कर्मफलत्यागी’
शब्द को तीन रूढ़शब्दों- ‘कर्म’, ‘फल’ और ‘त्यागी’ में विभाजित किया गया। अत: जब अनुक्रमणिका में हम ‘कर्म’
शब्द देखेंगे तो उसे पंक्ति क्रमांक 18.11.2 में
पाएँगे, उसके अतिरिक्त उस शब्द को भी पाएँगे जिसका यह घटक
है। ‘कर्म’ शब्द जिन अन्य शब्दों का
घटक बनकर प्रयुक्त हुआ है, वे हैं-....यत्कर्म(18.9.1), कर्मफलत्यागी
(18.11.2), शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म (18.15.1),… आदि।